बहुत पुराना मुहावरा है आदमी गुड़ न दे गुड़ जैसी बात तो कहे । कड़वी सच्ची बात को चाशनी लगाकर पचनीय बनाइये फिर बोलिये। शब्द की चोट बहुत गहरी होती है तलवार का घाव भर जाता है शब्द की टीस बनी रहती है। मुख से निकला शब्द वापस नहीं आता। बूमरैंग करता है भेष बदल के किसी वाइरस सा। तहज़ीभ बनती है शब्दों से और अपशब्द भी ,सारा खेल परवरिश से जुड़ा है। भाषा विरासत में मिलती है खानदानी भाषा ,हो सकता है अच्छी भाषा के भी जीवन खंड जीवन इकाइयां जींस होती हों कौन जाने। मामला नेचर और नर्चर दोनों से जुड़ा है। फिर भाषा वैयक्तिक लगाव का भी विषय है। किसी के लिए यह मेकअप है अलंकरण है सही सजधज है किसी के लिए बगनखा सामने वाले पे वार करने के लिए। घायल आदमी को दो बोल सहानुभूति के उस के जख्मों पे मरहम का काम करते हैं और बोल कर्कशा घाव को कुरेद देते हैं। कहते हैं संग का रंग चढ़ता है जो सबसे पहले हमारी अर्जित भाषा को ले डूबता है। आगे क्या कुछ हो सकता है वैयक्तिक अनुभव अलग अलग हो सकते हैं। शब्द हमारा आईडी हैं छत्र हैं तनौबा भी हो सकते हैं कटार भी। हम से लगभग सभी भारतीयों ने विशेषकर उत्तरभारतीय लोगों ने हिंद...
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